
अवसप्पिणीए पढमे काले मणुया ति-कोस-उच्छेहा
छट्ठस्स वि अवसाणे हत्थ-पमाणा विवत्था य ॥172॥
अन्वयार्थ : [अवसप्पिणिए पढमे काले मणुया तिकोसउच्छेहा] अवसर्पिणी के प्रथम काल के आदि में मनुष्यों का शरीर तीन कोस ऊँचा होता है [छट्टस्स वि अवसाणे हत्थपमाणा विक्त्था य] छठे काल के अन्त में मनुष्यों का शरीर एक हाथ ऊँचा होता है और छठे काल के जीव वस्त्रादि रहित होते हैं ।
छाबडा