
वि-ति-चउ-पंचक्खाणं जहण्ण-देहो हवेइ पुण्णाणं
अंगुल-असंख-भागो संख-गुणो सो वि उवरुवरिं ॥174॥
अन्वयार्थ : [वि ति चउपचक्खाणं] द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय, पंचेन्द्रिय [पुण्णाणं] पर्याप्त जीवों का [जहण्णदेहो] जघन्य शरीर [अंगुलअसंखभागो] घन अंगुल के असंख्यातवें भाग है [सो वि उवरुवरि] वह भी ऊपर-ऊपर [संखगुणो] संख्यातगुणा है ।
छाबडा