
अणुद्धरीयं कुंथो मच्छी काणा य सालिसित्थो य
पज्जत्ताण तसाणं जहण्ण-देहो विणिद्दिट्ठो ॥175॥
अन्वयार्थ : [आणुधरीयं कुन्थं] द्वीन्द्रियों में अणुद्धरी जीव, त्रीन्द्रियों में कुन्थु जीव [मच्छीकाणा य सालिसित्थो य] चतुरिन्द्रियों में काणमक्षिका, पंचेन्द्रियों में शालिसिक्थक नामक मच्छ इन [तसाणं] त्रस [पजत्ताण] पर्याप्त जीवों के [जहण्णदेहो विणिहिट्ठो] जघन्य शरीर कहा गया है ।
छाबडा