
जीवो णाण-सहावो जह अग्गी उण्हवो सहावेण
अत्थंतर-भूदेण हि णाणेण ण सो हवे णाणी ॥178॥
अन्वयार्थ : [जह अग्गी] जैसे अग्नि [सहावेण] स्वभाव से [उलओ] उष्ण है [जीवो णाणसहावो] वैसे ही जीव ज्ञान-स्वभाव है [अत्यंतरभूदेण हि] इसलिये अर्थान्तरभूत [णाणेण ण सो हवै णाणी] ज्ञान से ज्ञानी नहीं है ।
छाबडा