जीवस्स वि णाणस्स वि गुणि-गुण -भावेण कीरए भेओ
जं जाणदि तं णाणं एवं भेओ कहं होदि ॥180॥
अन्वयार्थ : [जीवस्स वि णाणस्स वि] जीव और ज्ञान के [गुणगुणिभावेण] गुणगुणिभाव से [भेओ] कथंचित् भेद [कीरए] किया जाता है [जं जाणदि णाणं] 'जो जानता है वह ही आत्मा का ज्ञान है' [एवं भेओ कहं होदि] ऐसा भेद कैसे होता है ।

  छाबडा