
णाणं भूय-वियारं जो मण्णदि सो वि भूद-गहिदव्वो
जीवेण विणा णाणं किं केण वि दीसदे कत्थ ॥181॥
अन्वयार्थ : [जो] जो [णाणं भूयवियारं मण्णदि] ज्ञान को. पृथ्वी आदि पंच-भूतों का विकार मानता है [सो वि भूदगहिदव्यो] वह भूत द्वारा ग्रहण किया हुआ है [जीवेण विणा णाणं] क्योंकि बिना ज्ञान के जीव [किं केण वि कत्थ दीसए] क्या किसी से कहीं देखा जाता है ?
छाबडा