+ जीव सर्वथा शुद्ध -- का निषेध -
जइ पुण सुद्ध-सहावा सव्वे जीवा अणाइ-काले वि
तो तव-चरण-विहाणं सव्वेसिं णिप्फलं होदि ॥200॥
अन्वयार्थ : [जइ] यदि [सव्वे जीवा अणाइकाले वि] सब जीव अनादिकाल से [सुद्धसहावा] शुद्ध-स्वभाव हैं [तो सव्वेसिं] तो सबही को [तवचरणविहाणं] तपश्चरण विधान [णिप्फलं होदि] निष्फल होता है ।

  छाबडा