णीसेस -कम्म-णासे अप्प-सहावेण जा समुप्पत्ती
कम्मज-भाव-खए वि य सा वि य पत्ती परा होदि ॥199॥
अन्वयार्थ : [जो णिस्से पकम्मणासे] जो समस्त कर्मों के नाश होने पर [अप्पसहावेण समुप्पत्ती] अपने स्वभाव से उत्पन्न हो और [कम्मनभावखए वि य] जो कर्मों से उत्पन्न हुए औदयिक आदि भावों का नाश होने पर उत्पन्न हो [सा वि य पत्ती परा होदि] वह भी परा कहलाती है ।

  छाबडा