
सव्वे कम्म-णिबद्धा संसरमाणा अणाइ-कालम्हि
पच्छा तोडिय बंधं सिद्धा सुद्धा धुवं होंति ॥202॥
अन्वयार्थ : [सव्वे] सब संसारी जीव [अणाइकालम्हि] अनादिकाल से [कम्माणबद्धा] कर्मों से बँधे हुए हैं [संसरमाणा] इसलिये संसार में भ्रमण करते हैं [पच्छा तोडिय बधं सिद्धा] फिर कर्मों के बन्धन को तोड़कर सिद्ध होते हैं [सुद्धा धुवं होति] तब शुद्ध और निश्चल होते हैं ।
छाबडा