+ बंध का स्वरूप -
जोअण्णोण्ण-पवेसो जीव-पएसाण कम्म-खंधाणं
सव्व-बंधाण वि लओ सो बंधो होदि जीवस्स ॥203॥
अन्वयार्थ : [जो] जो [जीवपएमाण कम्मखंधाणं] जीव के प्रदेशों का और कर्मों के स्कन्ध का [अण्णोण्णपवेसो] परस्पर प्रवेश होना (एक क्षेत्ररूप सम्बन्ध होना) और [सव्वबंधाण वि लओ] प्रकृति स्थिति अनुभाग सब बन्धों का लय (एकरूप होना) [ सो] सो [जीवस्स] जीव के [बंधो होदि] प्रदेशबंध होता है ।

  छाबडा