
जं वत्थु अणेयंतं तं चिय कज्जं करेदि णियमेण
बहु-धम्म-जुदं अत्थं कज्ज-करं दीसदे लोए ॥225॥
अन्वयार्थ : [जंवत्थु अणेयंत] जो वस्तु अनेकान्त है [तं चिय] सो ही [णियमेण] नियम से [कज्जं करेदि] कार्य करती है [लोए] लोक में [बहुधम्मजुदं अत्थं] बहुत धर्मों से युक्त पदार्थ ही [कज्जकरं दीसदे] कार्य करनेवाले देखे जाते हैं ।
छाबडा