
परिणामेण विहीणं णिच्चं दव्वं विणस्सदे णेव
णो उप्पज्जेदि सया एवं कज्जं कहं कुणदि ॥227॥
अन्वयार्थ : [परिणामेण विहीणं] परिणाम रहित [णिचं दव्वं णेव घिणस्सदे] नित्य द्रव्य नष्ट नहीं होता है [णो उप्पजदि य] और उत्पन्न भी नहीं होता है [कज्जं कहं कुणदि] तब कार्य कैसे करता है [एवं सया] और यदि उत्पन्न व नष्ट होवे तो नित्यपना नहीं ठहरे ।
छाबडा