पज्जय-मित्तं तच्चं विणस्सरं खणे खणे वि अण्णण्णं
अण्णइ -दव्व-विहीणं ण य क ज्जं किं पि साहिे द ॥228॥
अन्वयार्थ : [विणस्सरं] जो क्षणस्थायी [पज्जयमित्तच्चं] पर्यायमात्र तत्त्व [खणे खणे वि अण्णण्णं] क्षण क्षण में अन्य-अन्य होवे ऐसे विनश्वर मानें तो [अण्णइदव्वविहीणं] अन्वयी-द्रव्य से रहित होता हुआ [किं पि कज्ज ण य साहेदि] कुछ भी कार्य को सिद्ध नहीं करता है ।

  छाबडा