+ ज्ञान का स्वरूप -
णाणाधम्मेहिं जुदं अप्पाणं तह परं पि णिच्छयदो ।
जं जाणेदि सजोगं तं णाणं भण्णदे समए ॥२५३॥
अन्वयार्थ : [जं] जो [णाणाधम्मेहिं जुदं अप्पाणं तह परं पि] अनेक धर्मयुक्त आत्मा तथा परद्रव्यों को [सजोगं जाणेदि] अपने योग्य को जानता है [तं] उसको [णिच्छयदो] निश्चय से [समये] सिद्धान्त में [णाणं भण्णदे] ज्ञान कहते हैं ।

  छाबडा