किं बहुणा उत्तेण य जेत्तियमेत्ताणि संति णामाणि ।
तेत्तियमेत्ता अत्था संति ते णियमेण परमत्था ॥२५२॥
अन्वयार्थ : [कि बहुणा उत्तेण य] बहुत कहने से क्या ? [जेतियमेवाणि णामाणि संति] जितने नाम हैं [तित्तियमेत्ता] उतने [हि] ही [णियमेण] नियम से [अत्था] पदार्थ [परमत्था] परमार्थ रूप [संति] हैं ।

  छाबडा