
जं संगहेण गहिदं विसेस-रहिदं पि भेददे सददं
परमाणू पज्जंतं ववहार-णओ हवे सो हु ॥273॥
अन्वयार्थ : [जो] जिस नय ने [संगहेण] संग्रह नय से [विसेसरहिदं पि] विशेष-रहित वस्तु को [गहिदं] ग्रहण किया था उसको [परमारगूपज्जतं] परमाणु पर्यन्त [सददं] निरन्तर [भेददे] भेदता है [सो हु ववहारणओ हवे] वह व्यवहार नय है ।
छाबडा