
जो संगहेदि सव्वं देसं वा विविह-दव्व-पज्जायं
अणुगम-लिंग-विसिट्ठं सो वि णओ संगहो होदि ॥272॥
अन्वयार्थ : [जो] जो नय [सव्वं] सब वस्तुओं को [वा] तथा [देशं] देश अर्थात् एक वस्तु के भेदों को [विविहदव्वपञ्जायं] अनेक प्रकार द्रव्य-पर्याय सहित [अणुगमलिंगविसिटुं] अवन्य लिंग से विशिष्ट [संगहेदि] संग्रह करता है - एक स्वरूप कहता है [सो वि गयो संगहो होदि] वह संग्रह नय है ।
छाबडा