
सव्वेसिं वत्थूणं संखा-लिंगादि-बहु-पयारेहिं
जो साहदि णाणत्तं सद्द-णयं तं वियाणेह ॥275॥
अन्वयार्थ : [जो सव्वेसि वत्थूणं] जो नय सब वस्तुओं के [संखालिंगादिबहुपयारेहिं] संख्या लिंग आदि अनेक प्रकार से [णाण] अनेकत्व को [साहदि] सिद्ध करता है [तं सद्दणयं वियाणेह] उसको शब्द-नय जानना चाहिये ।
छाबडा