
जो एगेगं अत्थं परिणदि-भेदेण साहदे णाणं
मुक्खत्थं वा भासदि अहिरूढं तं णयं जाण ॥276॥
अन्वयार्थ : [जो अत्थं] जो नय वस्तु को [परिणदिभेदेण एगेगं साहदे] परिणाम के भेद से एक-एक भिन्न-भिन्न भेद रूप सिद्ध करता है [वा मुक्खत्थं भासदि] अथवा उनमें मुख्य अर्थ ग्रहण कर सिद्ध करता है [तं अहिरूढं णयं जाण] उसको समभिरूढ नय जानना चाहिये ।
छाबडा