रयणत्तये वि लद्धे तिव्व-कसायं करेदि जइ जीवो
तो दुग्गईसु गच्छदि पणट्ठ-रयणत्तओ होउं ॥296॥
अन्वयार्थ : [जइ जीवो] यदि यह जीव [रयणतये वि लद्धे] रत्नत्रय भी पाता है [तिब्धकसायं करेदि] और तीव्र-कषाय करता है [तो] तो [पणदुरयणतओ होऊ] रत्नत्रय का नाश करके [दुग्गईसु गच्छदि] दुर्गतियों में जाता है ।

  छाबडा