
सम्मत्ते वि य लद्धे चारित्तं णेय गिण्हदे जीवो
अह कह वि तं पि गिण्हदि तो पालेदुं ण सक्केदि ॥295॥
अन्वयार्थ : [सम्मत्रो वि य लद्धे] यदि सम्यक्त्व भी प्राप्त हो जाय तो [जीवो चारित्तं णेव गिण्हदे] यह जीव चारित्र ग्रहण नहीं करता है [अह कह वि तं पि गिण्हदि] यदि चारित्र भी ग्रहण करले [तो पालेदु ण सक्केदि] तो उसको पाल नहीं सकता है ।
छाबडा