अहवा देवो होदि हु तत्थ वि पावेदि कह व सम्मत्तं
तो तव-चरणं ण लहदि देस-जमं सील-लेसं पि ॥298॥
अन्वयार्थ : [अहवा देवो होदि हु] अथवा मनुष्यत्व में कदाचित् शुभ-परिणाम होने से देव भी हो जाय [तत्थ वि कह व सम्मत्तं पावेदि] और वहाँ कदाचित् सम्यक्त्व भी पा लेवे [तो तवचरणं ण लहदि] तो वहाँ तपश्चरण चारित्र नहीं पाता है [देसजम सीललेसं पि] देशव्रत (श्रावकव्रत) शीलवत (ब्रह्मचर्य अथवा सप्तशील) का लेश भी नहीं पाता है ।

  छाबडा