इय दुलहं मणुयत्तं लहिऊणं जे रमंति विसएसु
ते लहियं दिव्व-रयणं भूइ -णिमित्तं पजालंति ॥300॥
अन्वयार्थ : [इय दुलहं मणुय लहिऊणं जे विसएसु रमन्ति] ऐसा यह दुर्लभ मनुष्यत्व पाकर भी जो इन्द्रियों के विषयों में रमण करते हैं [ते दिव्यरयणं लहिय भूइणिमित्तं पजालंति] वे दिव्य (अमूल्य) रत्न को पाकर, भस्म के लिये दग्ध करते हैं - जलाते हैं।

  छाबडा