
जो जाणदि पच्चक्खं तियाल-गुण-पज्जएहिं संजुत्तं
लोयालोयं सयलं सो सव्वण्हू हवे देवो ॥302॥
अन्वयार्थ : [जो] जो [सयलं] समस्त [लोयालोयं] लोक और अलोक को [तियालगुणपजएहि संजुत्तं] तीन-काल गोचर समस्त गुण पर्यायों से संयुक्त [पञ्चक्खं] प्रत्यक्ष [जाणदि] जानता है [सो सव्वण्हू देओ हवे] वह सर्वज्ञ देव है ।
छाबडा