जदिण हवदि सव्वण्हू ता को जाणदि अदिंदियं अत्थं
इंदिय-णाणं ण मुणदि थूलं पि असेस-पज्जायं ॥303॥
अन्वयार्थ : [जदि सव्वण्हू ण हवदि] हे सर्वज्ञ के अभाववादियों ! यदि सर्वज्ञ नहीं होवे [ता अदिदियं अत्थं को जाणदि] तो अतीन्द्रिय पदार्थ ( जो इन्द्रियगोचर नहीं है ) को कौन जानता ? [इंदियणाणं] इन्द्रियज्ञान तो [थूलं] स्थूल पदार्थ ( इन्द्रियोंसे सम्बन्धरूप वर्तमान ) को जानता है [असेस पजायं पिण मुणदि] उसकी समस्त पर्यायों को भी नहीं जानता ।

  छाबडा