
सम्मत्त-गुण-पहाणो देविंद-णरिंद-बंदिओ होदि
चत्त-वओ वि य पावदि सग्ग-सुहं उत्तमं विविहं ॥326॥
अन्वयार्थ : [सम्मत्तगुणप्पहाणो] सम्यक्त्व गुण सहित जो पुरुष प्रधान है वह [देविंदणरिंदवंदिओ होदि] देवों के इन्द्र तथा मनुष्यों के इन्द्र आदि से वन्दनीय होता है [चत्तवयो वि य उत्तमं विविहं सग्गसुहं पावइ] व्रत-रहित होने पर भी उत्तम अनेक प्रकार के स्वर्ग के सुख पाता है ।
छाबडा