+ सम्यक्त्व का माहात्म्य -
रयणाण महा-रयणं सव्वं-जोयाण उत्तमं जोयं
रिद्धीण महा-रिद्धी सम्मत्तं सव्व-सिद्धियरं ॥325॥
अन्वयार्थ : [रयणाण महारयणं] रत्नों में तो महारत्न, [सव्वजोयाण उत्तम जोयं] सब योगों में उत्तम योग, [रिद्धीण महारिद्धि] ऋद्धियों में सबसे बड़ी ऋद्धि, [सव्वसिद्धियरं सम्मत्तं] सब सिद्धियों को करनेवाला यह सम्यक्त्व ही है ।

  छाबडा