+ दार्शनिक श्रावक -
बहु-तस-समण्णिदं जं मज्जं मंसादि णिंदिदं दव्वं
जो ण य सेवदि णियदं सो दंसण-सावओ होदि ॥328॥
अन्वयार्थ : [बहुतससमण्णिदं जं मज्जं मंसादि णिंदिदं दव्वं] बहुत से त्रस-जीवों के घात से उत्पन्न तथा उन सहित मदिरा का और अति निन्दनीय मांस आदि द्रव्य का [जो णियदं ण य सेवदि] जो नियम से सेवन नहीं करता है - भक्षण नहीं करता है [सो दंसणसावओ होदि] वह दार्शनिक श्रावक है ।

  छाबडा