जो दिढ-चित्तो कीरदि एवं पि वयं णियाण-परिहीणो
वेरग्ग-भाविय-मणो सो वि य दंसण-गुणो होदि ॥329 ॥
अन्वयार्थ : [एवं पि वय] ऐसे व्रत को [दिढचित्तो] दृढ़-चित्त हो [णियाणपरिहीणो] निदान ( इस लोक परलोक के भोगों की वांछा) से रहित हो [वेरग्गभावियमणो] वैराग्य से भावित (गीला) मनवाला होता हुआ [जो कीरदि] जो (सम्यग्दृष्टि पुरुष) करता है [सो वि य दंसणगुणो होदि] वह दार्शनिक श्रावक होता है ।

  छाबडा