भोयण-दाणे दिण्णे तिण्णि वि दाणाणि होंति दिण्णाणि
भुक्ख-तिसाए वाही दिणे दिणे होंति देहीणं ॥363॥
भोयण-बलेण साहू सत्थं संवेदि रत्ति-दिवसं पि
भोयण-दाणे दिण्णे पाणा वि य रक्खिया होंति ॥364॥
अन्वयार्थ : [भोयणदाणे दिण्णे तिणि वि दाणाणि होंति दिण्णाणि] भोजन दान देने पर तीनों ही दान दिये हुए हो जाते हैं [भुक्खतिसाएवाही देहीणं दिणे दिणे होंति] क्योंकि भूख प्यास नाम के रोग प्राणियों के दिन प्रतिदिन होते हैं [भोयणबलेण साहू रत्तिदिवसं पि सत्थं संवेदि] भोजन के बल से साधु रात दिन शास्त्र का अभ्यास करता है [भोयणदाणे दिण्णे पाणा वि य रक्खिया होंति] भोजन के देने से प्राणों की भी रक्षा होती है ।

  छाबडा