भोयणदाणेण सोक्खं ओसह-दाणेणं सत्थ-दाणेणं
जीवाण अभय-दाणं सुदुल्लहं सव्व-दाणेसु ॥362॥
अन्वयार्थ : [भोयणदाणेण सोक्खं] भोजनदान से सबको सुख होता है [ओसहदाणेण सत्थदाणं च] औषधदान सहित शास्त्रदान [जीवाण अभयदाणं] और जीवों को अभयदान [सव्वदाणेसु सुदुल्लहं] सब दानों में दुर्लभ है, उत्तम दान है ।

  छाबडा