
पुव्व-पमाण-कदाणं सव्व-दिसीणं पुणो वि संवरणं
इंदिय-विसयाण तहा पुणो वि जो कुणदि संवरणं ॥367॥
वासादि-कय-पमाणं दिणे दिणे लोह-काम-समणट्ठं
सावज्ज-वज्जणट्ठं तस्स चउत्थं वयं होदि ॥368॥
अन्वयार्थ : [पुव्वपमाणकदाणं सव्वदिसीणं पुणो वि संवरणं] श्रावक ने जो पहिले सब दिशाओं का परिमाण किया था उसका और भी संवरण करे [इंदियविसयाण तहा पुणो वि जो संवरणं कुणदि] और वैसे ही पहिले इन्द्रियों के विषयों का परिमाण भोगोपभोग परिमाण में किया था उसका और संकोच करे । [वासादिकयपमाणं दिणे दिणे लोहकामसमणट्ठं] वर्ष आदि तथा दिन दिन प्रति काल की मर्यादा लेकर करे, इसका प्रयोजन यह है कि अन्तरंग में तो लोभ कषाय और काम के शमन करने के लिये [सावजवज्जणटुं तस्स चउत्थं वयं होदि] तथा बाह्य में पाप हिंसादिक के वर्जने के लिये करता है उस श्रावक के चौथा शिक्षाव्रत होता है ।
छाबडा