पं-जयचंदजी-छाबडा
एसो बारस-भेओ उग्ग-तवो जो चरेदि उवजुत्तो
सो खवदि कम्म-पुंजं मुत्ति-सुहं अक्खयं लहदि ॥488॥
छाबडा