
इति यो व्रतरक्षार्थं सततं पालयति सकलशीलानि ।
वरयति पतिंवरेव स्वयमेव तमुत्सुका शिवपदश्री: ॥180॥
जो व्रतों के रक्षार्थ ये सब, शील भी पाले सतत ।
स्वयमेव उत्सुक मोक्ष लक्ष्मी, स्वयंवरवत् वरे नित ॥१८०॥
अन्वयार्थ : [य:] जो [इति] इस प्रकार [व्रतरक्षार्थं] पंच अणुव्रतों की रक्षा के लिये [सकलशीलानि] समस्त शीलों को [सततं] निरन्तर [पालयति] पालन करता है [तम्] उस पुरुष को [शिवपदश्री:] मोक्षरूपी लक्ष्मी [उत्सुका] अतिशय उत्कंठित [पतिंवरा इव] स्वयंवर की कन्या की तरह [स्वयमेव] स्वयं ही [वरयति] स्वीकार करती है अर्थात् प्राप्त होती है ।
Meaning : Like a damsel desiring a husband, the goddess of final beatitude herself longingly chooses him as a husband, who for protection of the Vratas, ceaselessly observes all the Sheelas.
टोडरमल