
क्षुत्तृष्णा हिममुष्णं नग्नत्वं याचनारतिरलाभ: ।
दंशो मशकादीनामाक्रोशो व्याधिदु:खमङ्गमलम् ॥206॥
स्पर्शश्च तृणादीनामज्ञानमदर्शनं तथा प्रज्ञा ।
सत्कारपुरस्कार: शय्या चर्या वधो निषद्या स्त्री ॥207॥
द्वाविंशतिरप्येते परिषोढव्या: परीष सततम् ।
संक्लेशमुक्तमनसा संक्लेशनिमित्तभीतेन ॥208॥
क्षुत् तृषा शीतोष्ण, दंशमशक नगनता याचना ।
अरति अलाभ आक्रोश स्त्री, रोग चर्या निषद्या ॥२०६॥
शैया अदर्शन देह-मल, वध तृणस्पर्श अज्ञानता ।
प्रज्ञा तथा सत्कार पुरष्कार बाइस जानना ॥२०७॥
संक्लेश विरहित चित्त से, संक्लेश साधनभीति से ।
हैं सतत सहने योग्य परिषह, आतमा के लक्ष्य से ॥२०८॥
अन्वयार्थ : [संक्लेशमुक्तमनसा] संक्लेशरहित चित्तवाला और [संक्लेशनिमित्त-भीतेन] संक्लेश के निमित्त से अर्थात् संसार से भयभीत साधु को [सततम्] निरन्तर [क्षुत्] क्षुधा, [तृष्णा] तृषा, [हिमम्] शीत, [उष्णम्] उष्ण, [नग्नत्वं] नग्नपना, [याचना] प्रार्थना, [अरति:] अरति, [अलाभ:] अलाभ, [मशकादीनांदंश:] मच्छरादि का काटना, [आक्रोश:] कुवचन, [व्याधिदु:खम्] रोग का दु:ख [अङ्गमलम्] शरीर का मल, [तृणादीनां स्पर्श:] तृणादिक का स्पर्श, [अज्ञानम्] अज्ञान, [अदर्शनम्] अदर्शन, [तथा] इसी प्रकार [प्रज्ञा] प्रज्ञा [सत्कारपुरस्कार:] सत्कार-पुरस्कार [शय्या] शयन, [चर्या] गमन, [वध:] वध, [निषद्या] आसन, [च] और [स्त्री] स्त्री-[एते] यह [द्वाविंशति:] बाईस [परिषहा:] परीषह [अपि] भी [परिषोढव्या:] सहन करने योग्य हैं ।
Meaning : Hunger, thirst, Cold, heat, insect bite nudity, ennui, women, walking, sitting, resting, abuse, beating, begging, non-obtaining, disease, contact with thorny shrubs etc., dirt, respect and disrespect, conceit of knowledge, lack of knowledge,slack belief, are 22 sufferings. These should be ever endured without any feeling of vexation, by one who desires to get rid of all cause for pain.
टोडरमल