
अधु्रवमशरणमेकत्वमन्यताऽशौचमास्रवो जन्म: ।
लोकवृषबोधिसंवरनिर्जरा: सततमनुप्रेक्ष्या: ॥205॥
अधु्रव अशरण भव एकत्व, अन्यताशुचि आस्रव ।
संवर निर्जरा लोक बोधि, कठिन वृष अनुप्रेक्ष्य नित ॥२०५॥
अन्वयार्थ : [अधु्रवम्] अधु्रव, [अशरणम्] अशरण, [एकत्वम्] एकत्व, [अन्यता] अन्यत्व, [अशौचम्] अशुचि, [आस्रव:] आस्रव, [जन्म:] संसार, [लोक-वृषबोधिसंवरनिर्जरा:] लोक, धर्म, बोधिदुर्लभ, संवर और निर्जरा [एताद्वादशभावना] इन बारह भावनाओं का [सततम्] निरन्तर [अनुप्रेक्ष्या:] बारम्बार चिन्तवन और मनन करना चाहिए ।
Meaning : Transitoriness, helplessness, mundaneness, loneliness, separateness, impurity, inflow, stoppage and shedding , Universe, variety of right path, and nature of Right path, should be contemplated continuously.
टोडरमल