+ अपूर्ण रत्नत्रय से कर्म-बंध -
असमग्रं भावयतो रत्नत्रयमस्ति कर्मबन्धो य: ।
स विपक्षकृतोऽवश्यं मोक्षोपायो न बन्धनोपाय:॥211॥
अपूर्ण रत्नत्रय सहित के, कर्म बन्ध विपक्ष से ।
रागादि ही बंधन करें, यह तो सतत शिवहेतु है ॥२११॥
अन्वयार्थ : [असमग्रं रत्नत्रयम्] अपूर्ण रत्नत्रय की [भावयत:] भावना वाले के [य: कर्मबन्ध: अस्ति] जो कर्म का बन्ध है [स:] वह [विपक्षकृत:] विपक्षकृत (राग-कृत) है, [अवश्यं मोक्षोपाय:] अवश्य ही मोक्ष का उपाय है, [न बन्धनोपाय:] बन्ध का उपाय नहीं है ।
Meaning : Even when Ratna-Traya is partially followed, whatever bondage of Karma there is, is due to its antithesis (the passions), because Ratna-Traya is assuredly the way to liberation, and can never be the cause of bondage.

  टोडरमल