
खित्ताइबाहिराणां अब्भिंतर मिच्छपहुदिगंथाणं ।
चाए काऊण पुणो भावह अप्पा णिरालंबो ॥30॥
क्षेत्रादिबाह्यानामभ्यंतरं मिथ्यात्वप्रभृतिग्रंथानाम् ।
त्यागं कृत्वा पुनर्भावयतात्मानं निरालंबम् ॥३०॥
अभ्यन्तर संग मोह है, बाह्य क्षेत्र, घर-बार ।
त्याग इन्हें निरलम्ब हो, कर तू आत्म-विचार ॥३०॥
अन्वयार्थ : [खित्ताइबाहिराणां] क्षेत्र आदि बाह्य और [मिच्छपहुदि अब्भिंतरगंथाणं] मिथ्यात्व आदि अन्तरंग परिग्रहों का [चाए] त्याग [काउण] करके [पुणो] पश्चात् [णिरालंबो] निरालम्ब [अप्पा] आत्मा की [भावह] भावना करो ॥३०॥