+ निश्चय अर्ह -
सो सण्णासे उत्तो णिच्छयवाईहिं णिच्छयणएण ।
ससहावे विण्णासो सवणस्स वियप्परहियस्स ॥29॥
स संन्यासे उक्तः निश्चयवादिभिर्निश्चयनयेन ।
स्वस्वभावे विन्यासः श्रमणस्य विकल्परहितस्य ॥२९॥
निर्विकल्प मुनिराज का, निज स्वभाव विन्यास ।
निश्चयज्ञ परमार्थ से, कहें उसे संन्यास ॥२९॥
अन्वयार्थ : [वियप्परहियस्स] विकल्प रहित जिस [सवणस्स] मुनि को [ससहावे] अपने स्वभाव में [विण्णासे] अवस्थान है [सो] वह [णिच्छयवाईहिं]
निश्चयवादियों के द्वारा [णिच्छयणएण] निश्चय नय से [सण्णासे] संन्यास के विषय में [अरिहो] अर्ह (योग्य) [उत्तो] कहा गया है ॥२९॥