
जाम ण गंथंछंडइ ताम ण चित्तस्स मलिणिमा मुंचइ ।
दुविहपरिग्गहचाए णिम्मलचित्तो हवइ खवओ ॥32॥
यावन्न ग्रंथं त्यजति तावन्न चित्तस्य मलिनिमानं मुंचति ।
द्विविधपरिग्रहत्यागे निर्मलचित्तो भवति क्षपकः ॥३२॥
तजे न जब तक संग यह, तब तक मन अपवित्र ।
द्विविध संग के त्याग से, मुनि होता शुचि चित्त ॥३२॥
अन्वयार्थ : [आराहओ] आराधक [जाम] जब तक [गंथं] परिग्रह को [ण छंडइ] नहीं छोड़ता है [ताम] तब तक [चित्तस्य] मन की [मलिणिमा] मलिनता को [ण मुंचइ] नहीं छोड़ता है [खवओ] क्षपक [दुविह परिग्गहचाए] दो प्रकार के परिग्रह के त्याग से ही [णिम्मलचित्तो] निर्मल चित्त [हवइ] होता है ।