+ क्षपक के अन्तरंग-बहिरंग परिग्रह का त्याग -
देहो बाहिरगंथो अण्णो अक्खाणं विसयअहिलासो ।
तेसिं चाए खवओ परमत्थे1 हवइ णिग्गंथो ॥33॥
देहो बाह्यग्रंथो अन्यो अक्षाणां विषयाभिलाषः ।
तयोस्त्यागे क्षपकः परमार्थेन भवति निर्ग्रंथः ॥३३॥
तजे भोग की लालसा, और बाह्य तनु, ग्रन्थ ।
मुनि दोनों के त्याग से, हो यथार्थ निर्ग्रन्थ ॥३३॥
अन्वयार्थ : [देहो बाहिरगंथो] शरीर बाह्य परिग्रह है और [अक्खाणं विसयअहिलासो] इन्द्रियों के विषयों की अभिलाषा होना [अण्णो अत्थि] अन्तरंग परिग्रह है । [तेसिं] उन (दोनों परिग्रहों) का [चाए] त्याग होने पर [खवओ] क्षपक [परमत्थे] परमार्थ से [णग्गंथो] निर्ग्रन्थ [हवइ] होता है ।