
सल्लेहणा सरीरे बाहिरजोएहि जा कया मुणिणा ।
सयलाविसा णिरत्था जाम कसाएण सल्लिहदि ॥35॥
सल्लेखना शरीरे बाह्ययोगैः या कृता मुनिना ।
सकलापि सा निरर्था यावत्कषायान्न सल्लिखति ॥३५॥
बाह्य योग से साधु जो, करे आप कृशकाय ।
किन्तु व्यर्थ वह है सभी, जब तक रहे कषाय ॥३५॥
अन्वयार्थ : [मुणिणा] मुनि के द्वारा [बाहिरजोएहि] बाह्य योगों के द्वारा [सरीरे जा सल्लेखना कया] शरीर की जो सल्लेखना की गई है [सा सयलावि] वह सबकी सब [ताव] तब तक [निरत्था] निरर्थक है [जाम] जब तक वह [कसाए न सल्लिहदि] कषायों की सल्लेखना नहीं करता ।