+ कषाय का स्वरूप -
अत्थि कसाया बलिया सुदुज्जया जेहि तिहुवणं सयलं ।
भमइ भमडिज्जंतो चउगइभवसायरे भीमे ॥36॥
अस्ति कषाया बलिनः सुदुर्जया यैस्त्रिभुवनं सकलम् ।
भ्रमति भ्राम्यमानं चतुर्गतिभवसागरे भीमे ॥३६॥
त्रिभुवन में दुर्जय विकट, ये कषाय बलवान ।
इससे फिरता जीव नित, चतुर्गति विश्व महान ॥३६॥
अन्वयार्थ : वे [कसाया] कषाय [बलिया] अत्यन्त बलवान और [सुदुज्जया] अत्यन्त कठिनाई से जीतने योग्य [अत्थि] हैं [जेहि] जिनके द्वारा [भमडिज्जंतो] घुमाया हुआ [सयलं तिहुवणं] समस्त त्रिभुवन [भीमे चउगइभवसायरे] भयंकर चतुर्गति रूप संसार-सागर में [भमइ] भ्रमण कर रहा है ।