+ उदाहरण -
पिच्छह णरयं पत्तो मणकयदोसेहिं सालिसित्थक्खो ।
इय जाणिऊण मुणिणा मणरोही हवइ कायव्वो ॥63॥
प्रेक्षध्वं नरकं प्राप्तो मनःकृतदोषैः शालिसिक्थाख्यः ।
इति ज्ञात्वा मुनिना मनोरोधो भवति कर्तव्यः ॥६३॥
शालिसिक्थ मन दोष से, पाता नरक, विलोक ।
मुनिवर, यह सब जानकर, चंचल मन को रोक ॥६३॥
अन्वयार्थ : [पिच्छह] देखो [मणकयदोसेहिं] मन से किये हुए दोषों के कारण [सालिसित्थक्खो] शालिसिक्थ नाम का मत्स्य [णरयं पत्तो] सप्तम नरक को प्राप्त हुआ था । [इय जाणिऊण] ऐसा जान कर [मुणिणा] मुनि के द्वारा [मणरोही] मन का निरोध [कायव्वो] करने योग्य [हवइ] है ।