
मणकरहो धावंतो णाणवरत्ताइ जेहिं ण हु बद्धो ।
ते पुरिसा संसारे हिंडंति दुहाइं भुंजंता ॥62॥
मनःकरभो धावन् ज्ञानवरत्रया यैर्न खलु बद्धः ।
ते पुरुषाः संसारे हिंडन्ते दुःखानि भुंजंतः॥६२॥
ज्ञान-रज्जु से मन-करम, किया न जिसने बद्ध ।
फिरता वह संसार में, दुःखों से हो विद्ध ॥६२॥
अन्वयार्थ : [हु] निश्चय से [जेहिं] जिन पुरुषों के द्वारा [धावंतो] दौड़ता हुआ [मणकरहो] मन रूपी ऊँट [णाणवरत्ताइ] ज्ञान रूपी मजबूत रस्सी के द्वारा [ण बद्धो] नहीं बाँधा गया है [ते पुरिसा] वे पुरुष [संसारे] संसार में [दुहाइं] दुःख [भुंजंता] भोगते हुए [हिंडंति] परिभ्रमण करते हैं ।