+ मन विस्तार का अभाव -
जहं जहं विसएसु रई पसमइ पुरिसस्स णाणमासिज्ज ।
तहं तहं मणस्स पसरो भज्जइ आलंबणारहियो ॥66॥
यथा यथा विषयेषु रतिः प्रशमति पुरुषस्य ज्ञानमाश्रित्य ।
तथा तथा मनसः प्रसरो भज्यते आलंबनारहितः ॥६६॥
ज्ञानालम्बन से घटे, विषयों का रति भाव ।
त्यों-त्यों होता शीघ्र ही, मन विस्तार अभाव ॥६६॥
अन्वयार्थ : [णाणमासिज्ज] ज्ञान को प्राप्त कर [पुरिसस्स रई] पुरुष की रति [जहं जहं] जिस-जिस प्रकार [विसऐसु] विषयों में [पसमइ] शान्त हो जाती है [तहं तहं] उसीप्रकार [आलंबणारहिओ] आलम्बन से रहित [मणस्स पसरो] मन का प्रसार [भज्जइ] भग्न हो जाता है ।