
विसयालंबणरहिओ णाणसहावेण भाविओ संतो ।
कीलइ अप्पसहावे तक्काले मोक्खसुक्खे सो ॥67॥
विषयालंबनरहितं ज्ञानस्वभावेन भावितं सत् ।
क्रीडति आत्मस्वभावे तत्काले मोक्षसौख्ये तत् ॥६७॥
विषय-हीन हो जब हृदय, प्रकटे सम्यग्ज्ञान ।
आत्म-रूप शिव सौख्य में, तब हो रक्त महान ॥६७॥
अन्वयार्थ : जब वह मन [विसयालंबणरहिओ] विषयों के आलम्बन से रहित होता हुआ [णाणसहावेण] ज्ञानस्वभाव से [भाविओ संतो] भावित होता है - ज्ञान स्वभाव में लीन होता है [तक्काले] तब [अप्पसहावे] आत्मा के स्वभावभूत [मोक्खसुक्खे] मोक्ष के सुख में [कीलइ] क्रीड़ा करता है ।