अमुणियतच्चेण इमं भणियं जं किंपि देवसेणेण ।
सोहंतु तं मुणिंदा अत्थि हु जइ पवयणविरुद्धम् ॥115॥
अज्ञाततत्त्वेनेदं भणितं यत्किंचिद्देवसेनेन ।
शोधयंतु तं मुनींद्रा अस्ति हि यदि प्रवचनविरुद्धम् ॥११५॥
देवसेन ने वह कहा, जो है आगम सिद्ध ।
शुद्ध करें मुनिजन उसे, जो हो कहीं विरुद्ध ॥११५॥
अन्वयार्थ : [अमुणियतच्चेण] तत्त्व को नहीं जानने वाले [देवसेणेण] देवसेन ने [इमं] यह [जं किंपि] जो कुछ [भणियं] कहा है, इसमें [हु] निश्चय से [जइ] यदि कुछ [पवयणविरुद्धं] आगम से विरुद्ध हो तो [तं] उसे [मुणिंदा] मुनिराज [सोहंतु] शुद्ध कर लें ।