+ आचार्य अपनी लघुता प्रकट करते हैं -
ण य मे अत्थि कवित्तं ण मुणामो छंदलक्खणं किंपि ।
णियभावणाणिमित्तं रइयं आराहणासारं ॥114॥
न च अस्ति कवित्वं न जाने छंदोलक्षणं किंचित् ।
निजभावनानिमित्तं रचितमाराधनासारम् ॥११४॥
मुझमें नहीं कवित्व है, नहीं छन्द का ज्ञान ।
आत्मभावना के लिए, आराधना कृति जान ॥११४॥
अन्वयार्थ : [ण मे कवित्तं अत्थि] न मैं कवि हूँ [य] और [ण किंपि छंदलक्खणं मुणामो] न मैं छंदों का लक्षण जानता हूँ । मैंने तो [णियभावणाणिमित्तं] मात्र
अपनी भावना के कारण [आराहणासारं] आराधनासार [रइयं] रचा है ।