न धर्मसदृश: कश्चित्सर्वाभ्युदयसाधक: ।
आनन्दकुञ्जकन्दश्च हित: पूज्य: शिवप्रद: ॥16॥
अन्वयार्थ : इस जगत में धर्म के समान अन्य कोई समस्त प्रकार के अभ्युदय का साधक नहीं है। यह मनोवांछित सम्पदा का देने वाला है। आनन्दरूपी वृक्ष का कन्द है अर्थात् आनन्द के अंकुर इससे ही उत्पन्न होते हैं तथा हितरूप, पूजनीय और मोक्ष का देने वाला भी यही है ॥१६॥

  वर्णीजी